आखिरकार, नैना साहनी के हत्यारे सुशील शर्मा को सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी के बदले उम्र कैद की सजा सुना ही दी। सुशील ने जुलाई, 1995 में अवैध संबंधों के शक में नैना की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इसके बाद उसने नैना के शव को दिल्ली के एक रेस्तरां में तंदूर में जलाने की कोशिश की थी। इस दौरान मामला खुल गया और पुलिस ने तंदूर से नैना का अधजला शव बरामद किया था। रेस्तरां मैनेजर केशव कुमार को मौके पर ही गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि शर्मा की गिरफ्तारी कुछ दिन बाद हुई थी। सत्र अदालत और दिल्ली हाई कोर्ट ने शर्मा को मौत की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 7 मई, 2007 को शर्मा की अपील विचारार्थ स्वीकार करते हुए उसकी सजा पर अंतरिम रोक लगा दी थी। शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की गुहार लगाई थी। बहस के दौरान शर्मा की सजा उम्रकैद में बदलने की गुहार लगाते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता जसपाल सिंह ने दलील दी थी कि यह मामला दुर्लभतम अपराध (रेयरेस्ट आॅफ रेयर) की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए शर्मा को मौत की सजा देना न्याय संगत नहीं है। उनका कहना था कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है इसलिए इसमें मौत की सजा नहीं दी जा सकती। युवा कांग्रेस के पूर्व नेता सुशील शर्मा को साल 2007 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फांसी की सजा सुनाते समय कहा था कि सुशील शर्मा का गुनाह माफ करने लायक नहीं है। रहम की कोई गुंजाइश भी नहीं है, ऐसे गुनाहगारों के लिए एक ही सजा है, सजा-ए-मौत। कोर्ट ने कहा कि सबूतों और गवाहों से ये साबित होता है कि सुशील शर्मा ने ही नैना साहनी की हत्या की और फिर उसकी लाश को तंदूर में जलाने की कोशिश की। कोर्ट का यह कहना सही है कि इस तरह का घृणित अपराध करने वाले अपराधी के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं है। लोग दिल दहलाने वाले इस हत्याकांड को अब तक भूले नहीं होंगे लेकिन साल-दर-साल जख्मों पर वक्त की परत चढ़ती गई। नैना के दोषी को फांसी मिले या उम्रकैद इसका फैसला करने में 18 वर्षों का समय लग गया। निश्चित रूप से एक बार फिर यह बात पुख्ता होगी कि देर से मिला न्याय भी अन्याय के समान है और यह मांग बलवती होगी कि न्यायिक प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करने में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए। स्वयं सर्वोच्च न्यायालय न्याय प्रक्रिया में देरी पर सवाल उठा चुका है। न्यायालय कई बार सरकार को बता चुका है कि कोर्ट के सामने मुकदमों की जो स्थिति है उसको देखते हुए त्वरित न्याय की उम्मीद करना व्यर्थ है लेकिन इस दिशा में उठाए गए कदम नाकाफी है। देरी से मिला न्याय जहां पीड़ित पक्ष के लिए पीड़ादायक होता है वहीं समाज में भी इसका सही संदेश नहीं जा पाता और अपराधियों के हौंसले बुलंद होते हैं। दिल्ली गैंगरेप के बाद ऐसे मामलों में शीघ्र न्याय की चाह बढ़ी है ताकि आरोपी पक्ष गवाह और पीड़ित पक्ष पर दबाव बना कर केस को कमजोर न कर सके। यह तभी संभव होगा जब त्वरित न्याय के मार्ग की सारी बाधाएं दूर की जाएंगी।
Tuesday, October 8, 2013
Wednesday, October 2, 2013
सजायाफ्ता नेताओं को क्यों मिले सहानुभूति?
दो दिनों में दो बड़े फैसले आए हैं। बहुचर्चित चारा घोटाले में फैसला 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आया है। इसी तरह 23 साल पुराने मेडिकल एडमिशन फर्जीवाड़ा मामले में कांग्रेस सांसद रशीद मसूद को दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने चार साल कैद की सजा सुनाई है। सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के मुताबिक, अगर किसी सांसद को दो साल कैद से ज्यादा की सजा सुनाई जाती है तो उसकी संसद सदस्यता रद्द हो जाएगी और वह जेल से चुनाव भी नहीं लड़ सकेगा। इस फैसले की जद में लालू के पहले रशीद मसूद आएंगे। दोनों ही मामलों में कानूनी प्रक्रिया करीब 2 दशकों तक चली है। इतने वक्त की लड़ाई में कई मोड़ ऐसे भी आए जब न्याय की आस टूटने लगी थी। हालांकि यह राहत की बात है कि देरी से ही सही लेकिन दोषियों को सजा मिल रही है। ऐसे में कई सवाल भी उठते हैं कि क्या इतनी देरी से मिलने वाली सजा का समाज में कोई संदेश जा पाएगा? क्या ये फैसले न्याय में देर है अंधेर नहीं की कहावत के अलावा भ्रष्टाचार या अपराधों को रोकने में भय का वातावरण तैयार कर पाएंगे? बहुत विश्वास से नहीं कहा जा सकता कि इससे भ्रष्टाचारियों को सबक मिलेगा और वे भविष्य में सत्ता का दुरुपयोग करने के पहले सोचेंगे। अभी तो इन फैसलों राजनीतिक महत्व ज्यादा है। लालू यादव की गिरफ्तारी 2014 के आम चुनाव को लेकर बनाए जा रहे समीकरणों को प्रभावित करेगी। ये फैसले राजनीतिक दृष्टि से इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सजायाफ्ता नेताओं को चुनाव के अयोग्य करार देनेवाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ठोस राजनीतिक राय कायम होगी और उस फैसले की काट में केंद्र सरकार द्वारा लाया गया राहतकारी अध्यादेश को खत्म करने की राह पुख्ता हो जाएगी। यह हमारे देश की राजनीति की विडंबना ही कही जानी चाहिए कि आने वाले चुनावों में इन सजायाफ्ता नेताओं की पार्टियां व समर्थक उनके नाम पर सहानुभूति मतों की उम्मीद करेंगे और बहुत हद तक उन्हें सहानुभूति मत मिल भी जाएंगे। यह भी संभव है कि लालू और राशिद के समर्थक जनता के बीच यह संदेश देने में कामयाब हो जाएं कि लालू और राशिद राजनीति का शिकार हुए हैं और इस आधार पर दोनों नेताओं का न केवल गुनाह कमतर कर दिया जाएगा बल्कि भ्रष्टाचार के खिलाफ संदेश भी उतना असरकारक नहीं रह पाएगा जितना इन दोनों को मिली सजा के बाद पहुंचना चाहिए था। इस बात की भी संभावना है कि जयललिता और जगन की तरह लालू भी सजा के बाद या सजा के दौरान ज्यादा जन समर्थन हासिल कर लें। यह भ्रष्टाचार पर मिली सजा को साबित करने की लड़ाई का दूसरे चरण है। कानूनी लड़ाई पूरी हो चुकी अब भ्रष्टाचार और अपराध पर मिली सजा को नैतिक रूप से कमतर करने की कोशिशों को बेअसर करने की चुनौती है। आप ही सोचिए क्या सजायाफ्ता नेताओं को सहानुभूति मिलना चाहिए?
Friday, September 13, 2013
एक फैसले से समाज के बदल जाने की उम्मीद
आखिरकार, अदालत ने भी दिल्ली गैंगरेप के आरोपियों को दोषी ठहरा दिया और सजा की बारी आ गई है। दोषियों को फांसी मिले या उम्र कैद या कुछ राहत मिल जाए लेकिन यह सवाल अब तक बकाया है कि क्या इस घटना से समाज ने कोई सबक लिया? क्या ये सजा निर्भया के साथ हुए अमानवीय कृत्य जैसी घटनाओं को रोक पाएगी? उम्मीदें कई हैं लेकिन आशंकाएं नाउम्मीद कर देती हैं। आंकड़े इस निराशा को गहरा करते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो बलात्कार और छेड़छाड़ की घटनाओं में कमी आती लेकिन ये तो लगातार बढ़ रही हैं। अब तो छेड़छाड़ का विरोध भी भारी पड़ रहा है। गुरुवार को भोपाल के पास नसरूल्लागंज में पड़ोसी युवक द्वारा लगातार छेड़छाड़ के बाद दुष्कर्म का प्रयास करने 21 वर्षीय युवती ने खुद को बचाने के लिए आत्मदाह कर लिया। युवती गंभीर अवस्था में भोपाल रेफर की गई है। एसडीएम के समक्ष हुए बयान में युवती ने युवक पर लगातार परेशान करने और दुष्कर्म का प्रयास करने की बात कही है। ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ रही है। निर्भया की आखिरी ख़्वाहिश बताते हुए उसकी मां कहती है कि उसने बोला था सजा क्या उन्हें तो जिÞंदा जला देना चाहिए। अगर उन्हें फांसी की सजा हो जाती है तो शायद उसकी आखिरी इच्छा पूरी हो जाए। ऐसे में एक सजा से क्या सामाजिक बुनावट में कोई बदलाव आएगा? तो क्या निर्भया के अपराधियों को सजा मिलने से हिंदुस्तान के हालात बदलेंगे? क्योंकि ऐसे मामलों में सजा के प्रावधान तो कई थे। जैसे, कात्यायन ने कहा है कि बलात्कारी को मृत्युदण्ड दिया जाए। नारदस्मृति में बलात्कारी को शारीरिक दंड देने का प्रावधान है। कौटिल्य के मुताबिक दोषी की संपत्तिहरण करके कटाअग्नि में जलाने का दंड दिया जाना चाहिए। याज्ञवल्क्य सम्पत्तिहरण कर प्राणदंड देने को उचित बताते हैं। मनुस्मृति में एक हजार पण का अर्थदंड, निर्वासन, ललाट पर चिह्न अंकित कर समाज से बहिष्कृत करने का दंड निर्धारित करती है। तो क्या आज सख्त सजा से बदलाव की आस नहीं की जा सकती? निर्भया की मां उम्मीद करती है कि अगर दोषियों को सही मायने में सजा मिल जाती है, तो फर्क जरूर पड़ेगा। अपराधियों को फांसी दिए जाने का जनता में बढ़िया संदेश जाएगा। एक बार ऐसा करने से पहले लोगों के मन में ख़्याल तो जरूर आएगा कि हम करेंगे तो फंसेंगे। लगता तो नहीं है कि हिंदुस्तान बदल रहा है लेकिन बदलाव की थोड़ी सी झलक दिखती है। पहले बदनामी के डर से दुष्कृत्य पीड़िता को चुप रखा जाता था।अब इतना तो बदलाव हुआ है कि लोग आगे आने लगे हैं, कार्रवाई तुरंत होने लगी है, अभियुक्त पकड़े जाने लगे हैं और उन्हें समय से सजा दी जा रही है। असल में त्वरित न्याय प्रक्रिया भी कानून के सख्ती से पालन और अपराधों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उम्मीद की जाना चाहिए कि इस फैसले के बाद भी ऐसा ही होगा।
Monday, August 26, 2013
और लगेंगी पाबंदियां, कड़े होंगे पहरे
और नहीं बस अब और नहीं... ऐसा हमें कितनी बार कहना होगा और कितनी बार ऐसे ही चुप हर जाना होगा? यह सवाल केवल सरकार या प्रशासन से ही नहीं समाज से भी है। कुछ महीने पहले जब दिल्ली में निर्भया के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, तो पूरा देश उबल पड़ा था। औरतों की सुरक्षा के सवाल पर हजारों युवा दिल्ली के राष्ट्रपति भवन के द्वार पर कई दिन तक जमे रहे थे। समाज में औरतों के दर्जे और पुरुषों की मानसिकता पर भी बहुत सारी बहसें चली थीं। ऐसे कानून बनाने की मांग भी उठी थी, जिससे बलात्कार के दोषियों को कड़ी सजा दी जा सके। लेकिन हुआ क्या? ऐसे मामलों की बाढ़ आ गई जैसे। हर तरफ से ऐसी ही मामलों की सूचनाएं। कहीं बेटियां घर में शिकार हुई तो कही सड़क पर भद्दी टिप्पणियों ने शर्मसार किया।
महिलाओं के साथ हिंसा और उत्पीड़न पुलिस के रोजनामचे में दर्ज होने वाले सामान्य अपराध से अलग है। यह सामाजिक पतन का गवाह है। पिछले दो दिन की खबरों पर ही गौर करिए। उत्तरी दिल्ली के कांझावाला में घर में 15 वर्षीय लड़की के साथ उसका 55 वर्षीय पिता दुष्कर्म करता रहा। पति-पत्नी का तलाक हो चुका है और बेटी पिता के साथ रहती थी। दूसरी घटना मुंबई कि जहां शुक्रवार देर शाम एक महिला पर हमला किया गया। वह महिला लोकल से जा रही थी तभी कुछ बदमाशों ने महिला पर तेजाब फेंकने की धमकी दी। साफ है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं है। यह ठीक है कि मुंबई पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए एक अपराधी को कुछ घंटे के भीतर ही पकड़ लिया, लेकिन सवाल है कि शाम छह-सात बजे जब वहशी ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं तब वह कहां होती है? क्या ऐसे मामलों में समाज मूक दर्शक ही बना रहेगा या पुलिस की तरह घटना के बाद पहुंच कर विरोध ही जताता रहेगा? जब सड़क पर या स्टेशन पर किसी महिला का अपमान होता है तब वहां खड़े लोग तमाशबीन क्यों बने रहते हैं? उसी समय विरोध और प्रतिकार का साहस कहां गया?
बलात्कार की घटनाओं को लेकर सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी जैसे तर्क बेमानी लगते हैं। असल में ऐसी घटनाओं के लिए पुरुषों की वह मानसिकता भी जिम्मेदार है, जो महिलाओं को न तो उनकी पारंपरिक घरेलू भूमिका से बाहर निकलते देखना चाहती है और न ही उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्वीकार कर पा रही है। ऐसी घटनाओं का बुरा परिणाम यह होगा कि अन्य लड़कियों पर परिवार द्वारा तमाम तरह की पाबंदियां लाद दी जाएंगी। जैसे, अकेले घर से जाओ, शाम को मत निकलो, नौकरी मत करो, कॉलेज मत जाओ आदि। ऐसा हो भी रहा है। दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई थीं, उसी तरह की प्रतिक्रियाएं मुंबई की घटना के बाद भी आने लगी हैं। यह पूछा जा रहा हैं कि सांझ ढलने के बाद उस सुनसान इलाके में वह लड़की गई ही क्यों थी? घटना के बाद सोशल मीडिया हो या अनौपचारिक बातचीत माता-पिताओं ने बेटी की सुरक्षा को लेकर डर जाहिर करते हुए तमाम तरह के प्रतिबंध की पैरवी की। यह प्रतिबंध प्यार से लागू किए जाएं या डरा कर लेकिन वास्तविक रूप में उसी पुरूषवादी सोच को बढ़ावा देंगी कि महिलाओं को घर के काम करने चाहिए। वह पढ़े क्यों और बाहर काम करने क्यों निकले? काम करने के लिए पुरूष है। हालांकि बलात्कार के आंकड़े और घटनाएं कुछ और ही कहानी कहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि सुनसान जगहों पर ही नहीं, बेटी हो या प्रौढ़ महिलाएं, वे अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। दुष्कर्म ज्यादातर घरों में होता है और अपराधी कोई रिश्तेदार या परिचित होता है। दरअसल, औरतों के साथ शारीरिक हिंसा और यौन उत्पीड़न के पीछे जो मानसिकता काम करती है, वह किसी सुनसान जगह या अवसर की तलाश में नहीं रहती। वह मानसिकता तो सरेराह, सभी के बीच महिलाओं को प्रताड़ित करती है। उसके निजत्व पर कब्जा जमा कर गुलाम बनाए रखने में यकीन करती है। हमें यह मानना होगा कि यह हमारे ही समाज की एक विकृति है और जब तक हम इसे दुरूस्त नहीं कर लेते आगे बढ़ती पत्नी, बहन या सहकर्मी तथा एक तरफा प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार करती युवती पर हमले होते रहेंगे। यह सच स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक हम इससे मुक्ति का रास्ता भी खोज नहीं पाएंगे। समाज को इस मानसिकता से मुक्त करवाना केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। सजग व तत्पर पुलिस और सख्त कानून दोनों बहुत आवश्यक हैं लेकिन हमें पूरे समाज की सोच को बदलने की मुहिम भी छेड़ना होगी। यह दोतरफा लड़ाई है। इसके कानूनी पक्ष को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों का निपटारा जल्दी हो। दूसरी तरफ, सामाजिक सुधारों के प्रति हमारा आग्रह ज्यादा प्रबल हो। यह हमारे समाज की विडंबना है कि 21 वीं सदी में भी नरेंद्र दाभोलकर को अंध विश्वास का विरोध करने के लिए जान गंवानी पड़ती है और महिलाओं को कुछ कुत्सित सोच वाले पुरूषों के कारण चार दीवारों में कैद होना पड़ता है। एक बार फिर उम्मीद युवाओं से ही है। वे ही इस मामले में ऐसी पहल कर सकते हैं जिसके कारण राजनीति हो या प्रशासन या समाज सभी को अपना रूख बदलना पड़े।
महिलाओं के साथ हिंसा और उत्पीड़न पुलिस के रोजनामचे में दर्ज होने वाले सामान्य अपराध से अलग है। यह सामाजिक पतन का गवाह है। पिछले दो दिन की खबरों पर ही गौर करिए। उत्तरी दिल्ली के कांझावाला में घर में 15 वर्षीय लड़की के साथ उसका 55 वर्षीय पिता दुष्कर्म करता रहा। पति-पत्नी का तलाक हो चुका है और बेटी पिता के साथ रहती थी। दूसरी घटना मुंबई कि जहां शुक्रवार देर शाम एक महिला पर हमला किया गया। वह महिला लोकल से जा रही थी तभी कुछ बदमाशों ने महिला पर तेजाब फेंकने की धमकी दी। साफ है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं है। यह ठीक है कि मुंबई पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए एक अपराधी को कुछ घंटे के भीतर ही पकड़ लिया, लेकिन सवाल है कि शाम छह-सात बजे जब वहशी ऐसी घटनाओं को अंजाम देते हैं तब वह कहां होती है? क्या ऐसे मामलों में समाज मूक दर्शक ही बना रहेगा या पुलिस की तरह घटना के बाद पहुंच कर विरोध ही जताता रहेगा? जब सड़क पर या स्टेशन पर किसी महिला का अपमान होता है तब वहां खड़े लोग तमाशबीन क्यों बने रहते हैं? उसी समय विरोध और प्रतिकार का साहस कहां गया?
बलात्कार की घटनाओं को लेकर सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी जैसे तर्क बेमानी लगते हैं। असल में ऐसी घटनाओं के लिए पुरुषों की वह मानसिकता भी जिम्मेदार है, जो महिलाओं को न तो उनकी पारंपरिक घरेलू भूमिका से बाहर निकलते देखना चाहती है और न ही उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्वीकार कर पा रही है। ऐसी घटनाओं का बुरा परिणाम यह होगा कि अन्य लड़कियों पर परिवार द्वारा तमाम तरह की पाबंदियां लाद दी जाएंगी। जैसे, अकेले घर से जाओ, शाम को मत निकलो, नौकरी मत करो, कॉलेज मत जाओ आदि। ऐसा हो भी रहा है। दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड के बाद जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आई थीं, उसी तरह की प्रतिक्रियाएं मुंबई की घटना के बाद भी आने लगी हैं। यह पूछा जा रहा हैं कि सांझ ढलने के बाद उस सुनसान इलाके में वह लड़की गई ही क्यों थी? घटना के बाद सोशल मीडिया हो या अनौपचारिक बातचीत माता-पिताओं ने बेटी की सुरक्षा को लेकर डर जाहिर करते हुए तमाम तरह के प्रतिबंध की पैरवी की। यह प्रतिबंध प्यार से लागू किए जाएं या डरा कर लेकिन वास्तविक रूप में उसी पुरूषवादी सोच को बढ़ावा देंगी कि महिलाओं को घर के काम करने चाहिए। वह पढ़े क्यों और बाहर काम करने क्यों निकले? काम करने के लिए पुरूष है। हालांकि बलात्कार के आंकड़े और घटनाएं कुछ और ही कहानी कहती हैं। आंकड़े बताते हैं कि सुनसान जगहों पर ही नहीं, बेटी हो या प्रौढ़ महिलाएं, वे अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। दुष्कर्म ज्यादातर घरों में होता है और अपराधी कोई रिश्तेदार या परिचित होता है। दरअसल, औरतों के साथ शारीरिक हिंसा और यौन उत्पीड़न के पीछे जो मानसिकता काम करती है, वह किसी सुनसान जगह या अवसर की तलाश में नहीं रहती। वह मानसिकता तो सरेराह, सभी के बीच महिलाओं को प्रताड़ित करती है। उसके निजत्व पर कब्जा जमा कर गुलाम बनाए रखने में यकीन करती है। हमें यह मानना होगा कि यह हमारे ही समाज की एक विकृति है और जब तक हम इसे दुरूस्त नहीं कर लेते आगे बढ़ती पत्नी, बहन या सहकर्मी तथा एक तरफा प्रेम प्रस्ताव अस्वीकार करती युवती पर हमले होते रहेंगे। यह सच स्वीकार नहीं कर लेते, तब तक हम इससे मुक्ति का रास्ता भी खोज नहीं पाएंगे। समाज को इस मानसिकता से मुक्त करवाना केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं है। सजग व तत्पर पुलिस और सख्त कानून दोनों बहुत आवश्यक हैं लेकिन हमें पूरे समाज की सोच को बदलने की मुहिम भी छेड़ना होगी। यह दोतरफा लड़ाई है। इसके कानूनी पक्ष को मजबूत करने के लिए जरूरी है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों का निपटारा जल्दी हो। दूसरी तरफ, सामाजिक सुधारों के प्रति हमारा आग्रह ज्यादा प्रबल हो। यह हमारे समाज की विडंबना है कि 21 वीं सदी में भी नरेंद्र दाभोलकर को अंध विश्वास का विरोध करने के लिए जान गंवानी पड़ती है और महिलाओं को कुछ कुत्सित सोच वाले पुरूषों के कारण चार दीवारों में कैद होना पड़ता है। एक बार फिर उम्मीद युवाओं से ही है। वे ही इस मामले में ऐसी पहल कर सकते हैं जिसके कारण राजनीति हो या प्रशासन या समाज सभी को अपना रूख बदलना पड़े।
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